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SC ने बदला "वोट के बदले नोट" वाला अपना ही फैसला, कहा "माननीयों" को "रिश्वतखोरी" की नहीं दी जा सकती "इजाजत",



रफीक खान
सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने वोट के बदले नोट मामले में माननीयों यानी कि सांसदों और विधायकों को आपराधिक मुकदमे से छूट देने से इनकार कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संसदीय विशेषाधिकार के तहत रिश्वतखोरी की छूट किसी भी कीमत पर माननीययों ही क्या, किसी को भी नहीं दी जा सकती। सुप्रीम कोर्ट की चीफ जस्टिस की अध्यक्षता वाली पीठ ने सोमवार को इस मामले पर अपना फैसला सुनाया। इस फैसले के बाद यह भी साफ हो गया है कि अब विधायक या सांसद पैसे लेकर किसी भी तरह का कार्य करते हैं, यानी की सदन में भाषण, प्रश्न या वोट जैसे मामले उनके द्वारा मैनेज किए जाते हैं तो सीधे तौर पर उनके खिलाफ आपराधिक प्रकरण चलाया जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने पीवी नरसिम्हा राव मामले में दिए गए खुद अपने फैसले से भी असहमति व्यक्त की और सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए पिछले फैसले को खारिज कर दिया। याद रहे कि पीवी नरसिम्हा राव बनाम सीबीआई मामले में साल 1998 के दौरान सदन में वोट के बदले नोट मामले में सांसदों को मुकदमे से छूट की बात कही गई थी।

मीडिया रिपोर्ट्स और विधिक सूत्रों के मुताबिक कहा जाता है कि फैसला सुनाते हुए मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि 'पीठ के सभी जज इस मुद्दे पर एकमत हैं कि पीवी नरसिम्हा राव मामले मे दिए फैसले से हम असहमत हैं।' नरसिम्हा राव मामले में अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने सांसदों-विधायकों को वोट के बदले नोट लेने के मामले में अभियोजन (मुकदमे) से छूट देने का फैसला सुनाया था। चीफ जस्टिस ने कहा कि 'माननीयों को मिली छूट यह साबित करने में विफल रही है कि माननीयों को अपने विधायी कार्यों में इस छूट की अनिवार्यता है।' मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि 'संविधान के अनुच्छेद 105 और 194 में रिश्वत से छूट का प्रावधान नहीं है क्योंकि रिश्वतखोरी आपराधिक कृत्य है और ये सदन में भाषण देने या वोट देने के लिए जरूरी नहीं है। पीवी नरसिम्हा राव मामले में दिए फैसले की जो व्याख्या की गई है, वो संविधान के अनुच्छेद 105 और 194 के विपरीत है।' मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि हम मानते हैं कि रिश्वतखोरी, संसदीय विशेषाधिकार नहीं है। माननीयों द्वारा किया जाने वाला भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी भारत के संसदीय लोकतंत्र को तबाह कर रहे हैं।

सात जजों की संविधान पीठ में यह शामिल रहे

कोर्ट ने कहा कि जो विधायक राज्यसभा चुनाव के लिए रिश्वत ले रहे हैं उनके खिलाफ भ्रष्टाचार रोधी कानून के तहत कार्रवाई होनी चाहिए। सात जजों की पीठ ने कहा है कि अगर सांसद पैसे लेकर सदन में सवाल पूछते हैं या वोट करते हैं, तो वे विशेषाधिकार का तर्क देकर अभियोजन से छूट का दावा नहीं कर सकते। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पैसे लेकर वोट देने या सवाल पूछने से भारत का संसदीय लोकतंत्र तबाह हो जाएगा। मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली सात जजों की संविधान पीठ में मुख्य न्यायाधीश के अलावा संविधान पीठ में जस्टिस एएस बोपन्ना, जस्टिस एमएम सुंदरेश, जस्टिस पी एस नरसिम्हा, जस्टिस जेपी पारदीवाला, जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस मनोज मिश्रा शामिल रहे। संविधान पीठ ने 1998 के झामुमो रिश्वतकांड पर दिए अपने फैसले पर पुनर्विचार के संबंध में सुनवाई पूरी कर बीते साल 5 अक्तूबर को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। अक्तूबर में सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में रिश्वत के बदले वोट के मामले में मिले विशेषाधिकार का विरोध किया था।सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान संसद या विधानसभा में अपमानजनक बयानबाजी को अपराध मानने के प्रस्ताव पर भी चर्चा हुई।

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