वर्ल्ड रामायण कॉन्फ्रेंस: भारत की संस्कृति भेदभाव से नहीं बल्कि आत्मा, चेतना और बुद्धि से परिभाषित होती है- आरिफ खान - khabarupdateindia

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Monday, 5 January 2026

वर्ल्ड रामायण कॉन्फ्रेंस: भारत की संस्कृति भेदभाव से नहीं बल्कि आत्मा, चेतना और बुद्धि से परिभाषित होती है- आरिफ खान


रफीक खान
चतुर्थ वर्ल्ड रामायण कॉन्फ्रेंस के समापन दिवस रविवार को बिहार के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने कहा कि भारत की संस्कृति भेदभाव से नहीं, बल्कि आत्मा, चेतना और बुद्धि से परिभाषित होती है। परमात्मा प्रत्येक हृदय में निवास करता है, इसलिए हर शरीर एक मंदिर है। भारत का धर्म ही आध्यात्मिकता है। भारत की आत्मा ही आध्यात्मिकता है। प्रभु श्रीराम के जीवन से निकली एकात्मकता की भावना हमारी साझा विरासत है, जिसका सार भगवान कृष्ण एवं कपिल मुनि के उपदेशों में भी मिलता है। World Ramayana Conference: Indian culture is not defined by discrimination but by soul, consciousness and intellect - Arif Khan

संस्कारधानी जबलपुर के मानस भवन में आयोजित चतुर्थ वर्ल्ड रामायण कॉन्फ्रेंस का भव्य समापन श्रद्धा, संस्कृति और शोध के अद्भुत संगम के साथ सम्पन्न हुआ। समापन समारोह में बिहार के राज्यपाल आरिफ़ मोहम्मद ख़ान प्रमुख अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। यह आयोजन न केवल राष्ट्रीय बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रामायण चिंतन का एक महत्वपूर्ण सत्संग सिद्ध हुआ। समारोह का शुभारंभ दीप प्रज्वलन के साथ हुआ। इस अवसर पर परम पूज्य बाबा कल्याण दास, पूज्य ज्ञानेश्वरी दीदी, मध्यप्रदेश शासन के संस्कृति मंत्री धर्मेंद्र सिंह, शिक्षा मंत्री राव उदय प्रताप सिंह, सांसद आशीष दुबे, महापौर जगत बहादुर सिंह अन्नू, विधायक अविनाश पांडे, आयोजन अध्यक्ष अजय बिश्नोई, आयोजन के सूत्रधार सचिव डॉ. अखिलेश गुमास्ता, पूर्व न्यायाधीश पंकज गौर, अधिवक्ता रवि रंजन सहित बड़ी संख्या में विद्वान, साधु-संत एवं संस्कारधानीवासी उपस्थित रहे।स्वागत उद्बोधन में आयोजन अध्यक्ष अजय बिश्नोई ने सम्मेलन के सभी आयामों पर प्रकाश डालते हुए जबलपुर में आयोजन के महत्व को रेखांकित किया।संस्कृति मंत्री धर्मेंद्र सिंह ने कहा कि रामायण मात्र ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन को दिशा देने वाली आधारशिला है। शिक्षा मंत्री राव उदय प्रताप सिंह ने कहा कि राज्यपाल को सुनना स्वयं में एक अद्भुत अनुभव है, राम का चरित्र नई पीढ़ी के लिए आचरण का प्रतिमान है। पूज्य ज्ञानेश्वरी दीदी ने युवाओं को संदेश देते हुए कहा- “रामादिवत् समाचरेत, न रावणादिवत्”, अर्थात राम के समान आचरण करें, रावण के समान नहीं।
सांसद आशीष दुबे जी ने कहा कि राम सुनने पढ़ने के साथ प्रमुखता जीने की चीज है चारित्रिक मूल्यों को मानवीय मूल्यों को हम एक शब्द में राम कहते हैं।

इंडो-थाई रामायण फोरम पर चर्चा

सत्र के आरंभ में इंडो-थाई रामायण फोरम पर विशेष चर्चा हुई। कोऑर्डिनेटर अमरेंद्र नारायण ने बताया कि इस फोरम की स्थापना प्रथम विश्व रामायण सम्मेलन में हुई थी, जिसका उद्देश्य भारत और थाईलैंड के बीच रामायण आधारित अकादमिक एवं सांस्कृतिक सहयोग को सुदृढ़ करना है। प्रो. नरेंद्र कौशिक (जयपुर) ने राम के पूर्वजों—शिवि, इक्ष्वाकु, सगर, भागीरथ, दिलीप, रघु आदि पर विस्तार से प्रकाश डाला। प्रो. अभिलाषा सिंह (अमरकंटक) एवं अध्यक्ष रविंद्र वाजपेई ने शोध पत्र प्रस्तुत किए।
प्रो. नीलांजना पाठक ने रामायण की पवित्र वनस्पतियों एवं जीव-जंतुओं से प्राप्त जीवन शिक्षाओं पर व्याख्यान दिया।शैलेंद्र तिवारी (भोपाल) ने युवाओं के संदर्भ में भगवान राम और माता सीता के त्याग पर सारगर्भित विचार रखे।

पुरातात्विक महत्व पर शोध

हाल-2 में डॉ. अजय तिवारी तथा शिवाकांत बाजपेई ने रावण के ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक महत्व पर शोध प्रस्तुत किया। डॉ. पर्व परमार ने रामायण से प्रबंधन के वे पाठ जो आज के युवाओं को सशक्त बनाने में सहायक हों विषय पर अपना शोध पत्र प्रस्तुत किया।पूज्य गो. आचार्य श्री रणछोड़लालजी (श्री आभरण बाबा) द्वारा रचित “श्रीरामवल्लभ” ग्रंथ का विमोचन राज्यपाल आरिफ़ मोहम्मद ख़ान, बाबा कल्याण दास एवं संतों के कर-कमलों से हुआ। यह ग्रंथ प्रभु श्रीराम की 108 नामावली, संस्कृत स्तोत्र, ब्रजभाषा पदावली तथा हिन्दी-अंग्रेज़ी विवेचन के साथ रामस्वरूप का दार्शनिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है।

संस्कृति, कविता और रामलीला

बाबा कल्याण दास ने अपने प्रवचन में कहा कि भारत ने कभी अपनी संस्कृति का अतिक्रमण नहीं किया। कार्यक्रम में प्रसिद्ध कवि सुदीप भोला एवं साथियों द्वारा रामायण आधारित कवि सम्मेलन तथा छिंदवाड़ा की रामलीला समिति द्वारा प्रस्तुत रामलीला के प्रसंगों ने समापन को अत्यंत भावपूर्ण बना दिया।

डॉ गुमाश्ता ने सभी को दिया श्रेय, ज्ञापित की कृतज्ञता

तीन दिवसीय भव्य और गरिमामय आयोजन के समापन अवसर पर कार्यक्रम को सफलता के शिखर तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाने वाले प्रख्यात अस्थि रोग विशेषज्ञ सचिव डॉ. अखिलेश गुमाश्ता ने कहा कि “आज जब यह दिव्य, वैचारिक और सांस्कृतिक महाकुंभ अपने सफल समापन की ओर अग्रसर है, तब हृदय कृतज्ञता से परिपूर्ण है। चतुर्थ वर्ल्ड रामायण कॉन्फ्रेंस केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि रामकथा के शाश्वत मूल्यों—धर्म, करुणा, मर्यादा, संस्कृति और मानवता—का वैश्विक संवाद बना।
इस ऐतिहासिक आयोजन को सफल बनाने में जिन-जिन महानुभावों, विद्वानों, साधु-संतों, शोधकर्ताओं, वक्ताओं, कलाकारों और प्रतिनिधियों ने भारत एवं विदेशों से आकर अपने विचार, शोध और अनुभव साझा किए, उन सभी के प्रति हम हार्दिक आभार व्यक्त करते हैं। आप सभी की सहभागिता से यह सम्मेलन विचार, श्रद्धा और शोध का सशक्त संगम बना।
हम माननीय अतिथियों, मुख्य वक्ताओं एवं विशिष्ट अतिथियों के विशेष रूप से आभारी हैं, जिनके मार्गदर्शक उद्बोधन ने इस आयोजन की गरिमा को नई ऊँचाइयाँ दीं। साथ ही केन्द्र सरकार संस्कृति मंत्रालय, श्रीरामचंद्र पथ गमन न्यास, प्रदेश शासन,नगर निगम प्रशासन, सहयोगी संस्थाओं, प्रायोजकों, मीडिया साथियों एवं समस्त स्वयंसेवकों का भी धन्यवाद, जिनके समर्पण और सहयोग के बिना यह आयोजन संभव नहीं हो पाता। मानस भवन जबलपुर की पावन भूमि पर आयोजित यह सम्मेलन रामायण की सार्वकालिक प्रासंगिकता को पुनः स्थापित करता है और आने वाली पीढ़ियों के लिए सांस्कृतिक चेतना का मार्ग प्रशस्त करता है। हमें विश्वास है कि यहाँ से निकले विचार, निष्कर्ष और संकल्प समाज को सकारात्मक दिशा देंगे। अंत में सभी सहभागियों, श्रोताओं एवं रामभक्तों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए भगवान श्रीराम की मर्यादा, आदर्श और करुणा हम सभी के जीवन में सतत प्रकाशमान रहने की कामना की।