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Saturday, 28 March 2026

भाई की याचिका पर डबल बेंच ने पूछा- आखिर किस कानून के तहत बिना FIR के कर ली जांच पूरी, अब 31 को सुनवाई

रफीक खान
मध्य प्रदेश के जबलपुर में आरटीओ रहे अजीज कुरैशी के अधिवक्ता पुत्र गयासुद्दीन कुरैशी की संदिग्ध मौत के मामले में हाई कोर्ट की डबल बेंच ने सख्त फटकार लगाई है। याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस ए.के. सिंह की युगलपीठ ने मृतक के भाई द्वारा लगाई गई याचिका की सुनवाई करते हुए पूछा है कि आखिर किस कानून के तहत बिना FIR दर्ज किए जांच की कार्रवाई पूरी कर ली गई? और यह निष्कर्ष भी निकाल लिया कि मामला अपराध की श्रेणी में नहीं आता?कानूनी प्रक्रिया और पुलिसिया कार्यप्रणाली को आईना दिखाने वाले इस मामले में लाश को कब्र से निकाल कर दोबारा पोस्टमार्टम करने की अपील ने झकझोर कर रख दिया। मामले की अगली सुनवाई 31 मार्च को निर्धारित की गई है। On the brother's petition, the double bench asked - under which law was the investigation completed without an FIR, now the hearing will be held on 31st.

जानकारी के मुताबिक कहा जाता है कि 26 मार्च 2025 को जबलपुर अधारताल निवासी गयासुद्दीन कुरैशी अपने पैतृक गांव नरसिंहपुर जिले के बहोरीपार में कथित हादसे का शिकार हुए। उन्हें गंभीर अवस्था में पहले जबलपुर के एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया और अगले दिन बेहतर इलाज के लिए नागपुर ले जाया गया, जहां उन्होंने दम तोड़ दिया। मृतक के भाई कसीमुद्दीन कुरैशी ने हाई कोर्ट में लगाई याचिका में कहा कि जबलपुर के अस्पताल की डिस्चार्ज रिपोर्ट में गयासुद्दीन के सीने पर चोट के निशानों का स्पष्ट उल्लेख था, जो इस बात की ओर इशारा करते हैं कि मौत सामान्य नहीं थी। भाई की मौत को संदिग्ध मानते हुए कसीमुद्दीन ने नरसिंहपुर पुलिस अधीक्षक को आवेदन देकर मांग की थी कि शव को कब्र से निकालकर उसका दोबारा पोस्टमार्टम कराया जाए ताकि मौत के वास्तविक कारणों का खुलासा हो सके। पुलिस की ओर से इस पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई, तो पीड़ित ने हाईकोर्ट का रुख किया।सरकारी अधिवक्ता ने युगलपीठ को बताया कि नरसिंहपुर के स्टेशन गंज थाना प्रभारी द्वारा इस मामले में प्रारंभिक जांच की गई थी। जांच रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा गया कि सभी संबंधित पक्षों के बयान दर्ज करने पर पुलिस इस नतीजे पर पहुंची है कि यह प्रकरण एफआईआर दर्ज करने योग्य नहीं है। हाईकोर्ट ने इस पर सवाल किया कि जब शिकायत एक संज्ञेय अपराध यानी कॉग्निजेबल ऑफेंस की ओर इशारा कर रही थी, तो पुलिस ने एफआईआर दर्ज क्यों नहीं की? पुलिस विभाग और SP कानून में दिए गए प्रावधानों को नजरअंदाज कैसे कर सकते हैं? गौरतलब है कि हाईकोर्ट की एकलपीठ ने पहले इस मामले को यह कहते हुए निरस्त कर दिया था कि रिकॉर्ड में ऐसे कोई पुख्ता सबूत नहीं हैं, जिनसे शुरुआती पोस्टमार्टम या पुलिस की प्रक्रिया में किसी गलत इरादे या कानूनी उल्लंघन की पुष्टि हो सके। युगलपीठ द्वारा की जा रही सुनवाई में पुलिस की कार्यप्रणाली और जांच की प्रक्रियात्मक त्रुटियों पर पूरा फोकस है। मामले में नरसिंहपुर पुलिस अधीक्षक को व्यक्तिगत रूप से हलफनामा दायर करने का निर्देश दिया गया है।