रफीक खान
सुप्रीम कोर्ट की डबल बेंच ने धर्मांतरण मामलों में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि सिख, हिंदू या बौद्ध धर्म अपनाने वाले ही अनुसूचित जाति का दर्जा प्राप्त कर सकते हैं। ईसाई आदि किसी अन्य धर्म में कन्वर्ट होने पर अनुसूचित जाति का व्यक्ति अपना आरक्षित दर्जा खो देगा। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस पीके मिश्रा और एनवी अंजारी की बेंच ने फैसला सुनाते हुए कहा कि दलित व्यक्ति यदि ईसाई धर्म में कन्वर्ट होता है तो वह अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम सहित सरकार की सभी सुविधाओं और अधिकारों का लाभ लेने का पात्र नहीं रह जाएगा। Only those who follow Hindu, Sikh or Buddhist religions will be included in Scheduled Castes, there will be a historic clarification in conversion cases.
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट का अपने आदेश में उल्लेख है कि कोई भी व्यक्ति जो हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म के अलावा किसी अन्य धर्म को मानता है, उसे अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जा सकता। अदालत ने साफ किया कि ईसाई बने व्यक्ति को SC/ST एक्ट का लाभ नहीं मिलेगा। जो व्यक्ति हिंदू धर्म से ईसाई धर्म में कन्वर्ट हो जाता है, उसे अनुसूचित जाति (SC) का सदस्य नहीं माना जा सकता और वह SC/ ST Act, 1989 के तहत संरक्षण का दावा नहीं कर सकता। जस्टिस पीके मिश्रा और जस्टिस ए वी अंजारिया की पीठ ने आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें कहा गया था कि जो व्यक्ति ईसाई धर्म अपना चुका है और सक्रिय रूप से उसका पालन करता है, वह अनुसूचित जाति समुदाय का सदस्य नहीं रह सकता। पादरी चिंथदा आनंद के आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट के मई 2025 के फैसले के खिलाफ दायर अपील पर सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला सुनाया था। सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के बाद व्यापक पैमाने पर सरकारी कर्मचारी और अधिकारियों के धर्म की छानबीन शुरू हो गई है, जो लाभ तो दलित वर्ग का ले रहे हैं लेकिन धर्म ईसाई अपने हुए हैं।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट का अपने आदेश में उल्लेख है कि कोई भी व्यक्ति जो हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म के अलावा किसी अन्य धर्म को मानता है, उसे अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जा सकता। अदालत ने साफ किया कि ईसाई बने व्यक्ति को SC/ST एक्ट का लाभ नहीं मिलेगा। जो व्यक्ति हिंदू धर्म से ईसाई धर्म में कन्वर्ट हो जाता है, उसे अनुसूचित जाति (SC) का सदस्य नहीं माना जा सकता और वह SC/ ST Act, 1989 के तहत संरक्षण का दावा नहीं कर सकता। जस्टिस पीके मिश्रा और जस्टिस ए वी अंजारिया की पीठ ने आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें कहा गया था कि जो व्यक्ति ईसाई धर्म अपना चुका है और सक्रिय रूप से उसका पालन करता है, वह अनुसूचित जाति समुदाय का सदस्य नहीं रह सकता। पादरी चिंथदा आनंद के आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट के मई 2025 के फैसले के खिलाफ दायर अपील पर सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला सुनाया था। सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के बाद व्यापक पैमाने पर सरकारी कर्मचारी और अधिकारियों के धर्म की छानबीन शुरू हो गई है, जो लाभ तो दलित वर्ग का ले रहे हैं लेकिन धर्म ईसाई अपने हुए हैं।
