तिपन नदी हत्याकांड में 13 साल बाद बड़ा फैसला, ‘लापरवाह जांच’ और अपर्याप्त साक्ष्यों का हवाला - khabarupdateindia

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तिपन नदी हत्याकांड में 13 साल बाद बड़ा फैसला, ‘लापरवाह जांच’ और अपर्याप्त साक्ष्यों का हवाला


रफीक खान
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की युगल पीठ ने एक महत्वपूर्ण फैसले में अनूपपुर जिले के वर्ष 2013 के तिपन नदी हत्याकांड में आजीवन कारावास की सजा पाए दो व्यक्तियों को बरी कर दिया। न्यायालय ने कहा कि मुकदमा कमजोर परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर टिका था और वह ‘संदेह से परे दोषसिद्धि’ के कठोर मानदंड पर खरा नहीं उतरा। जस्टिस विवेक अग्रवाल तथा जस्टिस अवनींद्र कुमार सिंह की पीठ ने अधार सिंह तथा पूरन सिंह की अपीलों को स्वीकार करते हुए द्वितीय अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, अनूपपुर के दोषसिद्धि आदेश को रद्द कर दिया। Major verdict in Tipan River massacre case after 13 years, citing 'sloppy investigation' and insufficient evidence

विशेष अभियोजन के अनुसार, 26 जुलाई 2013 की रात्रि को बृजेश सिंह, अधार सिंह एवं कैलाश सिंह अनूपपुर के रानीतालाब गांव में पूरन सिंह से एक सुजुकी मोटरसाइकिल खरीदने गए थे। लौटते समय कदमसरा गांव के समीप पार्क की गई एक ट्रक से टक्कर हो गई। अभियोजन का आरोप था कि अधार सिंह तथा पूरन सिंह ने पुलिस छानबीन से बचने के उद्देश्य से, बिना रजिस्ट्री वाली मोटरसाइकिल (जिसके इंजन एवं चेसिस नंबर जानबूझकर मिटा दिए गए थे) के भय से, घायल बृजेश सिंह को पुल से तिपन नदी में फेंक दिया। मृत शरीर दो दिन बाद, 29 जुलाई 2013 को, पुल से 2-3 किलोमीटर दूर नदी की चट्टानों में उलझा हुआ मिला।

न्यायालय का निर्णय

खंडपीठ द्वारा निर्णय में कहा गया कि कई महत्वपूर्ण गवाह, जिनमें मृतक के निकटतम संबंधी तथा कथित प्रत्यक्षदर्शी भी शामिल थे, मुकदमे के दौरान विपक्षी हो गए। पोस्टमॉर्टम करने वाले चिकित्सक भी यह स्पष्ट नहीं कर सके कि चोटें मृत्यु से पूर्व की थीं या पश्चात् की, तथा मृत्यु डूबने से हुई या मोटरसाइकिल दुर्घटना से हुई। शरीर पूर्णतः सड़ चुका था। न्यायालय ने जांच एजेंसी की लापरवाही पर गहरी नाराजगी जताते हुए कहा कि कथित ट्रक का कोई अता-पता नहीं मिला, क्षतिग्रस्त मोटरसाइकिल का कोई यांत्रिक निरीक्षण रिपोर्ट प्रस्तुत नहीं की गई, तथा शरीर बरामदगी की दूरी को लेकर गवाहों के बयानों में गंभीर अंतर्विरोध थे।

‘पंचशील’ सिद्धांत का पालन

खंडपीठ ने सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णय शरद बिर्धीचंद सरदा बनाम महाराष्ट्र राज्य (1984) में प्रतिपादित पंचशील सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए कहा कि परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की श्रृंखला पूरी होनी चाहिए तथा दोषी होने के अतिरिक्त हर अन्य संभावना कोई संभावना नहीं होना चाहिए। न्यायालय का स्पष्ट मत था- “अभियोजन पक्ष यह संदेह से परे सिद्ध नहीं कर सका कि बृजेश सिंह की मृत्यु दुर्घटना में हुई या हत्या का परिणाम थी। दो दिन बाद खुले नदी में सड़ी-गली अवस्था में बरामद शरीर स्वयं में कमजोर साक्ष्य है।” युगल पीठ ने दोनों अपीलकर्ता, जो अपनी गिरफ्तारी से निरंतर जेल में थे, को तत्काल रिहा किए जाने के आदेश दिए गए। पीठ ने अपने निर्णय में प्रतिपादित किया कि कितनी भी प्रबल आशंका हो, वह विधि के अनुसार ‘संदेह से परे प्रमाण’ का स्थान कभी नहीं ले सकती। अभियुक्तों की ओर से प्रशांत अवस्थी, आशीष त्रिवेदी, असीम त्रिवेदी, आनंद शुक्ला, अभिषेक पांडेय, आशीष तिवारी , विनीत टेहेनगुनिया, शुभम पाटकर ने पैरवी की।