कॉर्पोरेट अस्पतालों में मरीजों को अपने ही केमिस्ट या खास फार्मेसी से दवा खरीदने के लिए मजबूर किया जाना भी गंभीर - khabarupdateindia

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Wednesday, 30 September 2026

कॉर्पोरेट अस्पतालों में मरीजों को अपने ही केमिस्ट या खास फार्मेसी से दवा खरीदने के लिए मजबूर किया जाना भी गंभीर


रफीक खान
भारत की शीर्ष न्यायालय सुप्रीम कोर्ट आफ इंडिया के जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता ने मंगलवार को मेडिकल सिस्टम पर कड़ा प्रहार करते हुए टिप्पणी की कि यह कत्लेआम है, जो दिनदहाड़े डकैती के साथ किया जा रहा है। कैंसर की दवा ₹2700 की है और 27000 रुपए की बेची जा रही है। सारे जिम्मेदार आंखें बंद किए हुए हैं। इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि कॉर्पोरेट अस्पतालें अपने खास केमिस्ट और खास कंपनियों की दवा लेने के लिए भी मजबूर करते हैं। यह भी गंभीर विषय है। The practice of forcing patients in corporate hospitals to purchase medicines from their own in-house chemists or specific pharmacies is also a serious matter.

सुप्रीम कोर्ट की डबल बेंच का सीधा सवाल है कि जरूरी और गैर जरूरी दवाओं के बीच मार्जिन का अंतर क्यों है। हर दवा पर एमआरपी का 16 फीस दी मार्जिन रखने पर विचार किया जा सकता है। कोई मरीज सरकारी योजना के तहत इलाज कर रहा है तो दवा की कीमत का बोझ करदाता पर पड़ता है। युगल पीठ ने यह भी सवाल किया कि जब रिटेल में दर्शाई हुई कीमत का 10 गुना बढ़कर जरूरतमंद से वसूले जा रहे हैं तो उसकी लागत कितनी आती होगी। आखिर यह मुनाफाखोरी क्यों चल रही है। इस मुनाफाखोरी को क्यों चलने दिया जा रहा है। इस पर लगाम लगाने में किसी की दिलचस्पी क्यों नहीं है। चिकित्सा अब सेवा नहीं बल्कि उद्योग का रूप ले चुकी है, ऐसा होना नहीं चाहिए।