रफीक खान
मध्य प्रदेश के जबलपुर शहर का उपनगरीय क्षेत्र अधारताल यूं तो हमेशा की तरह सामान्य है लेकिन उसे अशांत करने की कोशिश लगातार चल रही है। कारण और बहाने अलग-अलग है। पुलिस और प्रशासन की दखल तो है लेकिन प्रभावी नियंत्रण नहीं है। ऐसा लगता है कि सिस्टम कठपुतली बना हुआ है। सुबह से लेकर रात तक उधेड़बुन सिर्फ आरोप-प्रत्यारोप और शिकस्त देने की लगी है। सोशल मीडिया में भी जमकर सरगर्मी है, यहां भी तार्किक और नैतिक बातों के बजाय मर्यादा लांघने की जीतोड़ कोशिश चल रही है। साइबर निगरानी करने वाली पुलिस की नजरों में यह सब कैद क्यों नहीं हो रहा? निर्वाचित जनप्रतिनिधि खामोश नहीं बल्कि गायब है? भटकी हुई मानसिकता को समन्वय के माध्यम से एक माला में पिरोने का अब तक कोई भी प्रयास सामने नहीं आया है।
Why are no coordinated efforts being made to stop those attempting to disturb the atmosphere? Are the elected representatives missing?
विगत दिनों अधारताल थाना अंतर्गत क्षेत्र स्थित गोल्डन ब्रायलर चिकन सेंटर में मरी हुई मुर्गियों के वायरल वीडियो और उसके बाद वहां हुई छापामार करवाई से इस पूरे मामले की पैदाइश जान पड़ती है। इसके पहले के संदर्भ और प्रसंग बहुत से हैं लेकिन जख्मों को कुरेदना उचित नहीं है। भौतिक तौर पर जितना सामने आया है, उसको ही समेट लेना सामायिक, सार्थक और प्रशासनिक दक्षता कहा जा सकता है। ब्रायलर चिकन सेंटर वाले की अपनी सफाई, आरोप तथा अपने एसोसिएशन के माध्यम से मांगों के बाद शिकायतकर्ता पक्ष का विरोध, धरना और प्रदर्शन जो भी संकेत दे रहा है... उसे जिम्मेदारों को समझना चाहिए। बात को गंभीरता से समझा नहीं गया तो जन्माष्टमी के दिन प्राचीन पचमठा मंदिर में दान पेटी की चोरी, एक मूर्ति को खंडित करने की शर्मनाक घटना तत्वों द्वारा अंजाम दे दी गई। यह घटना किस साजिश के तहत हुई, इसे बिल्कुल भी हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए। आरोपी भले ही अपना चेहरा ढककर मंदिर पहुंचे लेकिन आज जो साधन-संसाधन पुलिस के पास है, उनके चेहरों से नकाब को नोचना उतना कठिन काम नहीं है। उनके चेहरे हर हाल में बेनकाब किया जाना चाहिए तथा उन्हें उसके अंजाम तक भी पहुंचाना चाहिए। इसके बाद शनिवार को मैकेनिकल जोन में हुई तोड़फोड़ व मारपीट पर समुदाय विशेष द्वारा मुकदमा दर्ज कराया गया। मुलाहजे के पहले ही फिर मारपीट हुई और दूसरे पक्ष ने भी काउंटर कैस रजिस्टर्ड करवा दिया। यानी की बिना किसी ठोस वजह के, बिना किसी विषय के जमकर विवाद चल रहा है। ऐसा नहीं है कि पुलिस और प्रशासन में अंकुश लगाने का सामर्थ्य नहीं है किंतु पुलिस घटना और साजिशों के पीछे-पीछे चल रही है। निर्वाचित जनप्रतिनिधियों ने अभी तक इस पूरे घटनाक्रम पर नजर डालने और इनका खात्मा करने के लिए ज़हमत नहीं उठाई है।
